राष्ट्रीय

बिहपुर की उपेक्षा : शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार से वंचित एक प्रखंड की सच्चाई।

बिहार के भागलपुर जिले का बिहपुर प्रखंड गंगा और कोसी नदी के बीच बसा हुआ वह क्षेत्र है, जिसकी पहचान उसकी भौगोलिक जटिलताओं और प्राकृतिक आपदाओं से तो होती ही है, लेकिन इससे कहीं अधिक उसकी पहचान आज उपेक्षा की पीड़ा से जुड़ गई है। राज्य की राजनीति में वर्षों से बिहपुर का नाम आता रहा है, नेताओं ने वादे किए, घोषणाएँ कीं, लेकिन हकीकत यह है कि यहाँ की शिक्षा व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाएँ, रेलवे और रोजगार की स्थिति आज भी बदहाल है। आम लोग खुद को भागलपुर जैसे शहरी केंद्र पर आश्रित महसूस करते हैं और स्थानीय स्तर पर कोई ठोस पहल दिखाई नहीं देती।

सोनवर्षा में लड़को के लिए विद्यालय नहीं

सबसे बड़ी समस्या शिक्षा के क्षेत्र में नज़र आती है। प्रखंड का सबसे बड़ा गाँव सोनवर्षा है, जहाँ हजारों की आबादी रहती है। इतने बड़े गाँव में लड़कों के लिए एक भी विद्यालय नहीं है। यह स्थिति केवल चिंताजनक ही नहीं, बल्कि सरकारी दावों पर सवाल भी खड़े करती है। पूर्व में लड़के स्थानीय गर्ल्स स्कूल में पढ़ाई किया करते थे, लेकिन आज उनके लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं है। इससे गाँव के बच्चों का भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है। वहीं, विक्रमपुर के एक विद्यालय को प्रोन्नत कर इंटर कॉलेज बना तो दिया गया, लेकिन उसमें पढ़ाई के लिए पर्याप्त कमरे ही उपलब्ध नहीं हैं। बच्चे खुले बरामदों या टीनशेड के नीचे बैठकर पढ़ाई करने को मजबूर हैं। यह तस्वीर बताती है कि सरकार केवल घोषणाओं और कागजी कामों तक सीमित है, जमीनी हकीकत पर किसी की नज़र नहीं जाती।

बिहपुर के अस्पताल में महिला डाक्टर नहीं है

शिक्षा के बाद अगर स्वास्थ्य सेवाओं पर ध्यान दें तो स्थिति और भी भयावह दिखाई देती है। बिहपुर प्रखंड के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में ड्रेसर या फर्मासिस्ट जैसे बुनियादी कर्मियों का भी अभाव है। महिला चिकित्सक की कमी तो वर्षों से बनी हुई है। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की स्वास्थ्य संबंधी परेशानियाँ असंख्य हैं, लेकिन उनकी देखभाल के लिए कोई विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध नहीं है। गंभीर बीमारियों या प्रसव जैसी आपात स्थिति में लोगों को भागलपुर या अन्य शहरों का रुख करना पड़ता है। कई बार समय पर इलाज न मिलने से मरीज की जान तक चली जाती है। यह विडंबना है कि एक ओर सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार की बात करती है और दूसरी ओर जमीनी स्तर पर प्राथमिक सुविधाएँ भी उपलब्ध नहीं हैं।

थानाबिहपुर रेलवे स्टेशन की पहचान अब लौटेगी।

बिहपुर की उपेक्षा केवल शिक्षा और स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, रेलवे की स्थिति भी यहाँ की दुर्दशा को बयान करती है। बिहपुर रेलवे स्टेशन कभी थाना बिहपुर जंक्शन कहलाता था। यहाँ लोकोशेड हुआ करता था और परिचालन की स्थिति भी सुदृढ़ थी। लेकिन धीरे-धीरे स्टेशन की स्थिति गिरती चली गई। आज यह बदहाली का शिकार है। वर्षों से यहाँ की जनता थाना बिहपुर से महादेवपुर घाट रेलवे परिचालन की मांग कर रही है, लेकिन आज तक उनकी मांगें पूरी नहीं हो सकी हैं। रेलवे जैसी अहम सेवा, जो किसी भी क्षेत्र की आर्थिक और सामाजिक प्रगति का आधार होती है, उसकी उपेक्षा ने यहाँ के लोगों को और पीछे धकेल दिया है।

उच्च शिक्षा और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में भी बिहपुर की स्थिति दयनीय है। यहाँ आईटीआई कॉलेज, पैरामेडिकल कॉलेज या किसी भी प्रकार की व्यावसायिक शिक्षा संस्थान की व्यवस्था नहीं है। बच्चे अपनी पढ़ाई के लिए भागलपुर या अन्य बड़े शहरों पर आश्रित रहते हैं। इससे गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा का रास्ता और कठिन हो जाता है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवार अपने बच्चों को बाहर भेजने में सक्षम नहीं होते, जिसके कारण वे बीच में ही पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं।

रोजगार के नाम पर भी बिहपुर में लगभग शून्य संभावनाएँ हैं। यहाँ की जनता खेती और पशुपालन पर ही निर्भर है। खेती भी यहाँ आसान नहीं है। गंगा और कोसी के बीच बसे होने के कारण हर साल बाढ़ और कटाव किसानों को तबाह कर देता है। फसल का नुकसान, खेतों का बह जाना और पशुधन की हानि यहाँ के किसानों की नियति बन चुकी है। सरकारें आपदा के समय राहत और मुआवजे की घोषणाएँ तो करती हैं, लेकिन वास्तविक मदद कभी समय पर नहीं मिलती। किसान ऋण के बोझ तले दबते जाते हैं और युवाओं के लिए खेती-पशुपालन के अलावा कोई विकल्प मौजूद नहीं है।

यह स्थिति केवल आकस्मिक या प्राकृतिक कारणों से नहीं बनी है। यह दशकों की उपेक्षा का नतीजा है। सरकार और स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने कभी भी बिहपुर की वास्तविक समस्याओं को प्राथमिकता नहीं दी। चुनाव आते हैं, वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही सब कुछ भूल जाते हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों की अनदेखी यहाँ के बच्चों और युवाओं का भविष्य संकट में डाल रही है। रेलवे और बुनियादी ढाँचे के अभाव ने क्षेत्र की आर्थिक प्रगति रोक दी है।

आज बिहपुर की जनता यही सवाल कर रही है कि आखिर उनकी उपेक्षा कब तक जारी रहेगी। क्या यहाँ के बच्चों को अच्छे स्कूल और कॉलेज का अधिकार नहीं है? क्या यहाँ की महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ उपलब्ध नहीं कराई जा सकतीं? क्या यहाँ के किसानों की पीड़ा को अनदेखा करना ही सरकारों की नियति है? यह सवाल केवल बिहपुर का नहीं, बल्कि पूरे राज्य के उन इलाकों का है जहाँ विकास की गाड़ी अब भी पिछड़ी हुई है।

बिहपुर की असली तस्वीर यही है कि यहाँ के लोग मजबूर होकर शहरों पर आश्रित रहते हैं। बच्चे भागलपुर जाकर पढ़ते हैं, मरीज भागलपुर जाकर इलाज कराते हैं, और रोजगार के लिए युवा महानगरों की ओर पलायन करते हैं। यह पलायन और निर्भरता उस प्रणाली की पोल खोलती है जो विकास का दावा करती है लेकिन जमीनी हकीकत से कोसों दूर है।

जरूरत इस बात की है कि सरकार और स्थानीय प्रतिनिधि मिलकर बिहपुर की इन मूलभूत समस्याओं का समाधान करें। शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी जाए, रेलवे परिचालन बहाल किया जाए, और तकनीकी शिक्षा संस्थानों की स्थापना की जाए। जब तक ऐसे ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक बिहपुर केवल चुनावी वादों और अधूरे सपनों की भूमि बना रहेगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button